तमिलनाडु में बंधक बनाए गए 60 झारखंडी मजदूर किसी तरह लौटे, मजदूरी नहीं मिली, ट्रेन में भी झेला अपमान
काम और बेहतर जिंदगी की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करने वाले मजदूरों की स्थिति कितनी असुरक्षित हो सकती है, इसका एक चौंकाने वाला उदाहरण हाल ही में सामने आया है। झारखंड के करीब 60 मजदूर, जिन्हें तमिलनाडु में नौकरी का लालच देकर ले जाया गया था, कथित तौर पर वहां बंधक बनाकर रखे गए। किसी तरह अपनी जान बचाकर भागे ये मजदूर आखिरकार कई मुश्किलों का सामना करते हुए चक्रधरपुर लौटे, लेकिन उनकी वापसी की कहानी संघर्ष, शोषण और अपमान से भरी हुई है।
बेहतर नौकरी का सपना, लेकिन मिली कैद जैसी जिंदगी
मजदूरों के अनुसार, उन्हें ओडिशा के कुछ एजेंटों के माध्यम से तमिलनाडु के नमक्कल जिले के अन्नागुर इलाके में स्थित एक निजी मिल में काम के लिए भेजा गया था। एजेंटों ने उन्हें आकर्षक वेतन, रहने-खाने की बेहतर व्यवस्था और सुरक्षित कामकाजी माहौल का भरोसा दिलाया था।

लेकिन जब वे वहां पहुंचे, तो हालात बिल्कुल अलग निकले। मजदूरों का आरोप है कि उन्हें न तो तय मजदूरी दी गई और न ही बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। रहने की स्थिति बेहद खराब थी और खाने-पीने का भी समुचित इंतजाम नहीं था।
जब मजदूरों ने इन समस्याओं का विरोध किया, तो उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें मिल परिसर में ही रोककर जबरन काम कराया जाने लगा। कई मजदूरों का कहना है कि उन्हें बाहर जाने तक की इजाजत नहीं थी, जिससे उनकी स्थिति एक तरह से बंधक जैसी हो गई थी।
विरोध करने पर बढ़ा अत्याचार
मजदूरों ने बताया कि जैसे-जैसे उन्होंने अपनी मांगें उठानी शुरू कीं, वैसे-वैसे उन पर दबाव और बढ़ता गया। उन्हें धमकाया गया और काम छोड़ने या घर लौटने की कोशिश करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई।
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मजदूरों को अपनी जान का खतरा महसूस होने लगा। इसके बाद उन्होंने मौका देखकर वहां से भागने की योजना बनाई। बड़ी मुश्किल से वे मिल से निकलने में सफल हुए और किसी तरह रेलवे स्टेशन तक पहुंचे।
घर वापसी का सफर भी बना मुश्किल
मिल से निकलने के बाद मजदूरों ने एर्नाकुलम-टाटा एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ी, ताकि वे अपने घर झारखंड लौट सकें। लेकिन यह सफर भी उनके लिए आसान नहीं रहा।
मजदूरों के पास पैसे लगभग खत्म हो चुके थे। उन्होंने अपनी बची-खुची रकम इकट्ठा कर ट्रेन में जुर्माना (फाइन) भरकर यात्रा शुरू की। बावजूद इसके, उनका आरोप है कि ट्रेन में टीटीई और पेंट्री कार स्टाफ ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।
भूखे-प्यासे हालत में सफर कर रहे इन मजदूरों को सम्मानजनक व्यवहार की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें वहां भी अपमान और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।
चक्रधरपुर स्टेशन पर भी नहीं मिली राहत
शनिवार को जब ये मजदूर झारखंड के चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे, तो उन्हें लगा कि अब उनकी परेशानियां खत्म हो जाएंगी। लेकिन उनकी मुश्किलें यहीं भी जारी रहीं।
मजदूरों का कहना है कि स्टेशन पर भी टीटीई ने उनसे पैसे की मांग की, जबकि वे पहले ही जुर्माना देकर ट्रेन में यात्रा कर चुके थे। उनकी जेब में इतने पैसे भी नहीं बचे थे कि वे कुछ खाकर अपनी भूख मिटा सकें।
कुछ मजदूरों को स्टेशन पर रोके रखा गया और उनसे लगातार पैसे मांगे जाते रहे। बाद में जब पत्रकारों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, तब जाकर उन्हें वहां से जाने दिया गया।
सरकारी मदद पर उठे सवाल
इस पूरे मामले ने सरकारी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मजदूरों का कहना है कि उन्हें झारखंड सरकार की ओर से कोई ठोस सहायता नहीं मिली।
हालांकि, राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अधिकारियों को मजदूरों की मदद करने के निर्देश दिए थे और प्रशासन की ओर से यह दावा किया गया था कि मजदूरों को सुरक्षित वापस लाया जा रहा है।
लेकिन जमीनी स्तर पर मजदूरों के अनुभव इससे अलग नजर आए। उनका कहना है कि उन्होंने अपने दम पर ही यह मुश्किल सफर तय किया और रास्ते में किसी तरह की प्रभावी सरकारी सहायता नहीं मिली।
एजेंटों की भूमिका पर गंभीर आरोप
मजदूरों ने इस पूरे मामले में ओडिशा के एजेंटों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि एजेंटों ने उन्हें झूठे वादों के जरिए तमिलनाडु भेजा था।
बेहतर वेतन और सुविधाओं का सपना दिखाकर उन्हें वहां ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें शोषण और अत्याचार का सामना करना पड़ा।
मजदूरों का यह भी आरोप है कि विरोध करने पर एजेंटों ने उन्हें धमकी दी कि अगर वे वापस लौटे, तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
यह घटना एक बार फिर देश में प्रवासी मजदूरों की स्थिति को उजागर करती है। बेहतर रोजगार की तलाश में हजारों मजदूर हर साल दूसरे राज्यों में जाते हैं, लेकिन वहां उनकी सुरक्षा और अधिकारों की स्थिति अक्सर कमजोर रहती है।
ऐसे मामलों में न केवल दोषी कंपनियों और एजेंटों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है, बल्कि एक मजबूत व्यवस्था बनाने की भी आवश्यकता है, जिससे मजदूरों को सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिल सके।
सरकार और प्रशासन के लिए यह एक चेतावनी है कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठाएं, ताकि भविष्य में किसी भी मजदूर को इस तरह की यातना और शोषण का सामना न करना पड़े।
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