अपडेट: 2 मार्च 2026 | सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
होली का नाम आते ही रंग, गुलाल और मस्ती की तस्वीर सामने आ जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का एक गांव ऐसा भी है, जहां दुल्हेंडी के दिन रंगों से होली नहीं खेली जाती।
सहारनपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित औरंगाबाद गांव में पिछले लगभग 100 सालों से एक अनोखी परंपरा निभाई जा रही है। यहां होलिका दहन और पूजन तो होता है, लेकिन रंगों की होली की जगह धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
1927 से चली आ रही है परंपरा
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में वर्ष 1927 से यह परंपरा जारी है। दुल्हेंडी के दिन रंग खेलने की बजाय गांव में तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित होता है।
यह आयोजन आर्य समाज के तत्वावधान में किया जाता है, जिसमें यज्ञ, हवन, भजन और वेदों का उपदेश शामिल होता है।
गांव के लोग बताते हैं कि इस दौरान महर्षि दयानंद सरस्वती के संदेशों को घर-घर तक पहुंचाया जाता है और लोगों को वेदों के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया जाता है।
रंगों की जगह हवन और धार्मिक ज्ञान
जहां देशभर में दुल्हेंडी पर रंग और गुलाल उड़ते हैं, वहीं औरंगाबाद गांव में लोग सुबह पकवान बनाने के बाद सामूहिक हवन-पूजन में शामिल होते हैं।
तीन दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में:
- यज्ञ और हवन
- भजन-कीर्तन
- वेद और पुराणों का ज्ञान
- समाज सुधार के संदेश
जैसी गतिविधियां होती हैं।
क्यों नहीं खेली जाती रंगों की होली?
ग्रामीणों का कहना है कि इस परंपरा का उद्देश्य सामाजिक बुराइयों से दूर रहना और नई पीढ़ी को धार्मिक व सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना है।
उनके अनुसार, दुल्हेंडी पर होने वाले हुड़दंग, शराबखोरी और विवाद जैसी घटनाओं से बचने के लिए गांव ने वर्षों पहले यह रास्ता चुना था।
आज भी गांव के लोग उसी अनुशासन और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभा रहे हैं।
आसपास के गांव भी होते हैं शामिल
इस आयोजन में केवल औरंगाबाद ही नहीं, बल्कि आसपास के गांवों के लोग भी भाग लेते हैं। हर घर से सहभागिता होती है और सामूहिक रूप से यज्ञ में आहुति दी जाती है।
100 साल बाद भी परंपरा कायम
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से यही परंपरा देखी है।
होली के दिन पूजन, दुल्हेंडी पर धार्मिक कार्यक्रम और तीसरे दिन समापन — यह क्रम आज भी बदस्तूर जारी है।
रंगों की जगह यहां भक्ति और ज्ञान की रोशनी से होली मनाई जाती है।
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