नई दिल्ली | धर्म-आस्था डेस्क | अपडेट: मार्च 2026
हिंदू आस्था में छठ पर्व का एक बेहद खास स्थान माना जाता है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का प्रतीक है और पूरे श्रद्धा-भाव, शुद्धता और नियमों के साथ मनाया जाता है। आमतौर पर लोग कार्तिक छठ के बारे में ज्यादा जानते हैं, लेकिन चैत्र महीने में आने वाला चैती छठ भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कई इलाकों में इस पर्व को बड़े श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाता है। अब यह पर्व देश के दूसरे हिस्सों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
चैती छठ चार दिनों तक चलने वाला कठिन और पवित्र व्रत है। इस दौरान व्रती बेहद सादगी, स्वच्छता और अनुशासन का पालन करते हैं। व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, फिर खरना, इसके बाद संध्या अर्घ्य और आखिर में उषा अर्घ्य के साथ व्रत का पारण किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है, घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और संतान की उन्नति व स्वास्थ्य के लिए भी यह व्रत बहुत फलदायी माना जाता है।
चैती छठ 2026 कब से शुरू होगा?
साल 2026 में चैती छठ पर्व की शुरुआत 22 मार्च 2026 से होगी। इसी दिन नहाय-खाय किया जाएगा। इसके बाद 23 मार्च को खरना, 24 मार्च को डूबते सूर्य को संध्या अर्घ्य और 25 मार्च 2026 को उगते सूर्य को उषा अर्घ्य दिया जाएगा। उषा अर्घ्य के बाद ही व्रती पारण करके चार दिनों का यह कठिन व्रत पूरा करेंगे।
चैती छठ 2026 का पूरा शेड्यूल
- 22 मार्च 2026, रविवार: नहाय-खाय
- 23 मार्च 2026, सोमवार: खरना
- 24 मार्च 2026, मंगलवार: संध्या अर्घ्य
- 25 मार्च 2026, बुधवार: उषा अर्घ्य और पारण
यह शेड्यूल उन श्रद्धालुओं के लिए बेहद अहम होता है जो पहले से तैयारी करना चाहते हैं। छठ पूजा में घर की साफ-सफाई से लेकर प्रसाद बनाने, पूजा सामग्री जुटाने और घाट जाने तक हर काम नियमपूर्वक किया जाता है। इसलिए तिथियों की सही जानकारी पहले से होना जरूरी माना जाता है।
नहाय-खाय से होती है पर्व की शुरुआत
छठ पर्व के पहले दिन को नहाय-खाय कहा जाता है। इस दिन व्रती सुबह स्नान करके घर और रसोई की विशेष सफाई करते हैं। भोजन सात्विक और शुद्ध तरीके से बनाया जाता है। आमतौर पर कद्दू-भात, चने की दाल और सादा भोजन ग्रहण किया जाता है। इसी दिन से व्रती अपने आहार-विहार में विशेष सावधानी बरतना शुरू कर देते हैं। माना जाता है कि व्रत की शुद्ध शुरुआत नहाय-खाय से ही होती है, इसलिए इस दिन का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है।
नहाय-खाय के दिन केवल भोजन ही नहीं, बल्कि मन और व्यवहार की शुद्धता पर भी जोर दिया जाता है। व्रती कोशिश करते हैं कि घर में शांत और पवित्र वातावरण बना रहे। यही कारण है कि छठ पर्व को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अनुशासन, संयम और आस्था का उत्सव भी कहा जाता है।
खरना के दिन रखा जाता है निर्जला उपवास
चैती छठ का दूसरा दिन खरना कहलाता है। यह दिन व्रत की दृष्टि से बहुत कठिन माना जाता है, क्योंकि व्रती दिनभर उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में गुड़ या शक्कर की खीर, रोटी और कुछ जगहों पर रसियाव का भोग लगाया जाता है। पहले भगवान को प्रसाद अर्पित किया जाता है, फिर व्रती इसे ग्रहण करते हैं। इसके बाद से लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है।
खरना का प्रसाद बहुत पवित्र माना जाता है। घर के लोग और पड़ोसी भी इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यही वह दिन होता है, जब छठ पर्व की आध्यात्मिक भावना घर-घर में और अधिक गहरी दिखाई देती है।
संध्या अर्घ्य का दृश्य होता है बेहद भावुक और भक्तिमय
तीसरे दिन यानी संध्या अर्घ्य के अवसर पर व्रती नदी, तालाब, पोखर या कृत्रिम घाटों पर पहुंचते हैं। इस दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती सूप में ठेकुआ, केला, नारियल, गन्ना, सिंघाड़ा, नींबू और अन्य पूजन सामग्री सजाकर सूर्य देव को अर्पित करते हैं। घाटों पर छठ गीत गूंजते हैं और पूरा माहौल भक्ति से भर जाता है।
छठ की सबसे खूबसूरत बात यह मानी जाती है कि इसमें डूबते सूर्य की भी पूजा की जाती है। यह जीवन के उस संदेश को दर्शाता है जिसमें उदय और अस्त, दोनों को समान सम्मान दिया जाता है। यही वजह है कि छठ पर्व को प्रकृति, ऊर्जा और कृतज्ञता का पर्व भी कहा जाता है।
उषा अर्घ्य के साथ पूरा होता है महापर्व
चैती छठ के चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य को उषा अर्घ्य दिया जाता है। भोर होते ही श्रद्धालु फिर से घाटों पर पहुंचते हैं और सूर्य की पहली किरण के साथ अर्घ्य अर्पित करते हैं। इसके बाद छठी मैया से परिवार की खुशहाली, संतान की उन्नति, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है।
उषा अर्घ्य के बाद व्रती पारण करते हैं और प्रसाद बांटते हैं। इसी के साथ चार दिनों तक चलने वाला यह पवित्र पर्व संपन्न होता है। कई परिवारों में इस समय भावुक माहौल भी देखने को मिलता है, क्योंकि छठ केवल परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी आस्था का उत्सव भी है।
चैती छठ का धार्मिक और सामाजिक महत्व
चैती छठ सूर्य देव की उपासना का पर्व है। सूर्य को जीवन, प्रकाश, ऊर्जा और स्वास्थ्य का स्रोत माना गया है। इसलिए छठ पूजा में सूर्य देव को अर्घ्य देकर जीवन में सकारात्मकता, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। साथ ही छठी मैया को संतानों की रक्षक और परिवार की सुख-समृद्धि देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है।
इस पर्व की एक बड़ी खासियत इसकी सादगी है। इसमें दिखावा नहीं, बल्कि शुद्धता और समर्पण सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। मिट्टी के चूल्हे, बांस के सूप, प्राकृतिक फल, घर में बने ठेकुआ और पारंपरिक गीत इस पर्व को और भी खास बनाते हैं। यह पर्व परिवार और समाज को जोड़ने का काम भी करता है। छठ के दौरान लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, घाट सजाते हैं और सामूहिक रूप से पूजा का माहौल बनाते हैं।
छठ पूजा में किन बातों का रखा जाता है ध्यान?
- रसोई और पूजा स्थल की विशेष सफाई की जाती है।
- भोजन और प्रसाद पूरी शुद्धता से बनाया जाता है।
- लहसुन-प्याज और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है।
- पूजा सामग्री में बांस का सूप, दौरा, नारियल, केला, गन्ना और ठेकुआ शामिल होते हैं।
- व्रती पूरे नियम, संयम और श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं।
आज भी क्यों बना हुआ है छठ का विशेष महत्व?
आधुनिक जीवनशैली में भी छठ पर्व की लोकप्रियता कम नहीं हुई है, बल्कि बढ़ती ही दिख रही है। इसकी वजह है इसकी गहरी आस्था, परिवार से जुड़ाव और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव। यही कारण है कि गांवों से लेकर महानगरों तक, हर जगह छठ पूजा की तैयारी बड़े उत्साह से होती है। जो लोग अपने मूल गांव से दूर रहते हैं, वे भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा से मनाने की कोशिश करते हैं।
चैती छठ भले ही कार्तिक छठ जितना व्यापक रूप से चर्चा में न रहता हो, लेकिन इसकी धार्मिक महत्ता किसी भी तरह कम नहीं मानी जाती। श्रद्धालुओं के लिए यह पर्व मनोकामना, समर्पण और विश्वास का प्रतीक है।
डिस्क्लेमर
यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पंचांग आधारित तिथियों और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित सामान्य जानकारी के लिए तैयार किया गया है। अलग-अलग स्थानों और परंपराओं के अनुसार पूजा-विधि या समय में थोड़ा बदलाव संभव है।
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